Monday, July 20, 2009

था वोह घर का चिराग, जो घर को जला आया
था वो कोई मेहमान, के मैं उन्हें अपना न बना पाया

बांटा न था समंदर ने कभी, न कोई इस ज़मीन को चीर पाया
था वो अपना ही कभी, जो हमें दफन कर आया

कैसी मजबूरी, कैसा मजहब, कैसा ईमान, कैसा इंसान
जो इक माँ को अपने बच्चों से अलग कर आया

था वोह घर का चिराग, जो घर को जला आया
था वो कोई मेहमान, के मैं उन्हें अपना न बना पाया

बहती थी नदियाँ खुशियों की कभी, इन खेतों में फसलें लहराया करती थीं
अब बहते हैं कतरे खून के, इंसान जाग तू अपनों को अपना न समझ पाया

खिंची थी लकीरें किसी ने बांटने मजहबों को, जिन्हें हम ने कभी न गैर बुलाया
आ गले लग जा, मिला कदम साथ चलें के खुशहाली का मौसाम फ़िर लौट आया

था वोह घर का चिराग, जो घर लौट आया
न था वो कोई मेहमान, मेरा अपना था जिसे आज फ़िर मैं अपना बना आया

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