Tuesday, February 17, 2009

हर मोड़ पे मंज़र से लोग भी बदल जाते
वफ़ा का क्या जब रिश्ते ही बदल जाते हैं
ख़ाक चुनते रहते है इंसान मिले टुकड़े कहीं ख़्वाबों के
उन ख़्वाबों का क्या जब चेहरे ही बदल जाते हैं
इस तकल्लुफ भरी ज़िन्दगी में बने निशाँ ख्वाइश है सबकी
अपने माज़ी के निशाँ मिटाते चलते जाते हैं
मिले न मिले मंजिल तकदीर से लड़ने को सभी तैयार
बेवकूफी में सीधे रास्ते छोडे चले जाते हैं
क्या बेताबी रही सबको कुछ बन दिखाने की
बने बनाये मकाम छोडे चले जाते हैं
उनको बेवकूफ बुलाने वालों में सबसे बड़ा मैं भी हूँ
दिल को है आराम बस हराम किए चले जाते हैं

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