हर मोड़ पे मंज़र से लोग भी बदल जाते
वफ़ा का क्या जब रिश्ते ही बदल जाते हैं
ख़ाक चुनते रहते है इंसान मिले टुकड़े कहीं ख़्वाबों के
उन ख़्वाबों का क्या जब चेहरे ही बदल जाते हैं
इस तकल्लुफ भरी ज़िन्दगी में बने निशाँ ख्वाइश है सबकी
अपने माज़ी के निशाँ मिटाते चलते जाते हैं
मिले न मिले मंजिल तकदीर से लड़ने को सभी तैयार
बेवकूफी में सीधे रास्ते छोडे चले जाते हैं
क्या बेताबी रही सबको कुछ बन दिखाने की
बने बनाये मकाम छोडे चले जाते हैं
उनको बेवकूफ बुलाने वालों में सबसे बड़ा मैं भी हूँ
दिल को है आराम बस हराम किए चले जाते हैं
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