Thursday, February 26, 2009

बेडियाँ

साकित पानी को छलकाया न करो
सोती उन तितलियों को उडाया न करो
उन कच्ची कलियों में जान अब भी बाकी है
उन्हें अपने बालों में यूं सजाया न करो

सकून मिलता रहा जब गुलशन में फूल खिलते थे
दैरा उफक में जब धनुक दिखा करते थे
इक कालीन सी जब बिछ जाती थी बहार
उस शबनम और धुंद में जब तुम न दिखा करते थे

उल्फत न थी कभी, ज़िन्दगी बस यूं ही गुज़रती थी
हर दिन हर रात इक नई बात हुआ करती थी
कल की तो न कभी सोचा करते थे
दोस्तों के संग सिर्फ़ आज की बात हुआ करती थी

उमंग भरी ज़िन्दगी कब गुज़र गई पता न चला
आज़ाद को पिंजरे का पता न चला
वो गैर अपने कब बने पता न चला
मकाम कब बदल गए पता न चला

इसे तुम कोई शिकायत न समझ लेना
फासला बढ़ाने का कोई ख्याल न समझ लेना
तसव्वुरी तो कभी थे हे नहीं
गुमशुदा दिल की अफरा तफरी समझ लेना

मसला न था कोई जब मिले थे
न संग रहे तबाह हुए थे
न बदला था कुछ इन सालों में
न हम कभी बेवफा हुए थे

खिली थी कभी कलियाँ इन शाखों पे
परिंदे भी कभी दिखा करते थे
लिपटे थे बेल से कभी तुम आसमान को छूने को
सूखे शाख अब झुका करते हैं

टूट गिरने से पहले मैं फिर उड़ना चाहता हूँ
बेफिक्र फिर खिलना चाहता हूँ
इक बार ही सही पर फ़िर दिल की करना चाहता हूँ
नफा को नफरत में न बदलने देना
मैं बस इन बेडियों से निकलना चाहता हूँ

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