Thursday, February 26, 2009

क्यों


रंग भरी इस दुनिया में यह सुर्ख उभरता क्यों हैं
जली उस मांग में उतरता क्यों हैं
मासूम उन हातों को यूं जकड़ता क्यों हैं
निचोडा है जिस्म को किसी सांप ने शायद
बेरहम सूखे लहू की लकीरों में मेहंदी सा सजता क्यों है
कातिल हैं शायद उन ख़्वाबों का
मासूम एहसास और नादान वादों का
कुछ वक्त तक चमकेगा बिंदिया बनकर, गुम जायेगा
गुलाल सा इक दिन धुल जाएगा, मिट जाएगा फरेबी
बस वो नादान असलियत के सामने झुक जाएगा
चूर हो जाएगा

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