कर गुजरने की तमन्ना जाने क्यों लौट आती है
ढलती उम्र में फ़िर जीने की चाह क्यों जाग जाती है
शम्मे जले थे जो उनके आने पर
दबी मोहब्बतों की वो मशाल फ़िर क्यों जल जाती है
जी रहे थे हम कुछ गुमनाम इंसानों से, दूर उन पैमानों से
काफिर की जुबां पे दुआ क्यों आ जाती है
छोड़ते क्यों नहीं पहर इस बेहोशी की हालत में हमको
दर्द में ख़ाक खुशी नज़र आती है
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