A few words strung together that made sense to me.
Thursday, May 7, 2009
गवाहों की क्या ज़रूरत, जब ख़ुद के कातिल हम हैं जाने किन वादों पर जीते रहे, झूठे तो हम हैं क्या निकलेगी आह किसी पर, ख़ुद को न संभाल पाये दुआ मांगते तो रहे, पर दो रस्ते पर खड़े हम हैं
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