चाहतें दबाने से कभी दबती नहीं
उम्मीदें बाँधने से कभी बंधती नहीं
जो कलपते रहे तकदीरों पे रोज रोज
उनकी ज़िन्दगी कभी उभरती नहीं
शब्द लिखे लगते रहे बहुत आसान
निभाए निभती नहीं
धुल जाती हैं वो मुस्कुराहटें आसुओं में
कम्भक्त दिल की बातें मुझसे संभालती नहीं
लाचार सा इक कोने में पड़ा रहता हूँ
बेकारी में कलम घिसता रहता हूँ
कहने को रहा इतना की लिखता रहा
जाने ये ज़ुबान क्यों खुलती नहीं
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