झाँका जो उनकी आंखों में,
तस्सवुर बस अपना ही दिखता रहा
नकारते रहे वो उम्र भर,
पर झलकता आँसू हमें दिखता रहा
तकदीरों के गाँठ कुछ ऐसे बंधे,
खुलते तो न थे बस काट देते थे
कुछ पलों की खुशी के लिए
खून के आँसू बहा देते थे
कटी थी जुबां बचाने को उन्हें कभी
वरना आज भी उन्हें वापिस बुला रहे होते
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