घुट घुट के जीना अब आदत सी बन चुकी है
के अब ख़ुशी के अलफ़ाज़ ही नहीं निकलते
आज हम दर्द के मारे कुछ बोल तो देते हैं
और वो आंसुओं से पोंछ देते हैं
ऐसी मोहब्बत किस काम की
जो दूसरों को रुलाती रहे
और हमें रोज़
इस दर्द के तले दबाती रहे
कभी सोचते हैं के, खुद को मिटा देना ही गर हो मुमकिन
तो कर लेते, लेकिन
कौन संभालता उनको
जो हैं साथ मरने वाले
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