क्या सरहद क्या कौम इस दुनिया को बांटेगी
बस वो कौमी हैं जो खुद की हदों को बांटे जीया करते हैं
इन बेरहमों को क्या पता दर्द - ऐ - इंसानियत क्या होती है
उनको दिए ज़ख्मों में कुछ बूँद खून हमारा भी बहता है
हटाओ उन्हें इन कुर्सियों की दीवारों से जो सरहदें बनी बैठी हैं
आओ फिर बना लें इक जहान, जहाँ सिर्फ खुशियाँ रहती हैं
जहाँ हम तुम पड़ोसियों से गले मिला करते हैं
जहाँ हम तुम इंसानों से दिखा करते हैं
No comments:
Post a Comment